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धम्मपद 4.3

जो इस शरीर को झाग की तरह जानता है और इसे मरीचिका के समान पदार्थहीन जान चुका है, वह मार के फूल-बाण को तोड़ डालेगा और मृत्यु के राजा को कभी नहीं देखेगा।

अंग्रेजी अनुवाद: एफ. मैक्स मुलर (1881)। स्रोत

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यह श्लोक आपमें क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से प्रेरणा लेता है और आपके अपने मार्ग का सम्मान करता है।

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