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धम्मपद 26.37

उसे मैं सच में एक ब्राह्मण कहता हूँ जो सर्वत्र प्राणियों का विनाश और पुनरागमन जानता है, जो बंधन से मुक्त है, कल्याण में स्थित है (सुगत), और जागृत है (बुद्ध)।

अंग्रेजी अनुवाद: एफ. मैक्स मूलर (1881)। स्रोत

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यह श्लोक आपमें क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से खींचता है और आपके अपने मार्ग का सम्मान करता है।

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