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धम्मपद 26.36

उसे मैं सच में ब्राह्मण कहता हूँ जिसने सुख और दुःख दोनों को त्याग दिया है, जो शीतल है और सभी पुनर्जन्म के कीटाणुओं से मुक्त है, वह नायक जिसने सभी लोकों को जीत लिया है।

अंग्रेजी अनुवाद: F. Max Müller (1881). स्रोत

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यह श्लोक आपके अंदर क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से ग्रहण करते हैं और आपके अपने मार्ग का सम्मान करते हैं।

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