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धम्मपद 26.29

जिसके कोई हित नहीं हैं, और जिसने सत्य को समझकर 'कैसे, कैसे?' नहीं कहते, और जो अमरत्व की गहराई तक पहुँच गए हैं, उन्हें मैं ब्राह्मण कहता हूँ।

अंग्रेजी अनुवाद: एफ. मैक्स मूलर (1881)। स्रोत

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यह श्लोक आपमें क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से लेते हैं और आपके अपने पथ को सम्मान देते हैं।

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