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धम्मपद 26.28

जो इस लोक और परलोक दोनों के लिए कोई इच्छा नहीं रखता, जिसके कोई झुकाव नहीं हैं और जो मुक्त है, उसे ही मैं सच में ब्राह्मण कहता हूँ।

अंग्रेजी अनुवाद: F. Max Müller (1881)। स्रोत

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यह श्लोक आपके भीतर क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से ज्ञान लेता है और आपके अपने मार्ग का सम्मान करता है।

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