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धम्मपद 26.27

मैं उस ब्राह्मण को सच में कहता हूँ जो दुनिया में कुछ भी नहीं लेता जो उसे नहीं दिया गया हो, चाहे वह लंबा हो या छोटा, छोटा हो या बड़ा, अच्छा हो या बुरा।

अंग्रेजी अनुवाद: एफ. मैक्स मुलर (1881)। स्रोत

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यह श्लोक आपके भीतर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से लेते हैं और आपके अपने पथ को सम्मान देते हैं।

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