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धम्मपद 26.23

मैं उस ब्राह्मण को सच में कहता हूँ जो किसी भी प्राणी में दोष नहीं देखता, चाहे वह दुर्बल हो या शक्तिशाली, और न किसी को मारता है और न हिंसा करता है।

अंग्रेजी अनुवाद: F. Max Müller (1881)। स्रोत

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यह श्लोक आपमें क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से निकालता है और आपके अपने पथ का सम्मान करता है।

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