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धम्मपद 25.6

जो कुछ उसने प्राप्त किया है उसे तुच्छ न समझे, और न कभी दूसरों से ईष्या करे: जो भिक्षु दूसरों से ईष्या करता है वह मन की शांति नहीं पाता।

अंग्रेजी अनुवाद: F. Max Müller (1881). स्रोत

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