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धम्मपद 25.17

वह दान में रहे, अपने कर्तव्यों में पूर्ण हो; तब आनंद की पूर्णता में वह कष्ट का अंत करेगा।

अंग्रेजी अनुवाद: F. Max Müller (1881)। स्रोत

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