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धम्मपद 25.12

भिक्षु, ध्यान करो और असावधान मत हो! अपने विचार को उस ओर निर्देशित मत करो जो आनंद देता है, ताकि तुम अपनी असावधानी के कारण नरक में लोहे की गेंद को निगलने के लिए बाध्य न हो, और जलते समय `यह दर्द है' कहकर चिल्लाओ न।

अंग्रेजी अनुवाद: एफ. मैक्स मुलर (1881)। स्रोत

आनंद के साथ इस श्लोक पर विचार करें

यह श्लोक आपके भीतर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से लेते हैं और आपके अपने मार्ग का सम्मान करते हैं।

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