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धम्मपद 21.3

जो करना चाहिए उसकी उपेक्षा की जाती है, जो नहीं करना चाहिए वह किया जाता है; अनुशासनहीन, विचारहीन लोगों की इच्छाएं सदा बढ़ती रहती हैं।

अंग्रेजी अनुवाद: F. Max Müller (1881)। स्रोत

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