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धम्मपद 18.7

प्रार्थनाओं का दोष अनावृत्ति है; घरों का दोष मरम्मत न करना है; शरीर का दोष आलस्य है; रक्षक का दोष असावधानी है।

अंग्रेजी अनुवाद: F. Max Müller (1881)। स्रोत

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