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धम्मपद 18.20

आकाश में कोई पथ नहीं है, कोई व्यक्ति बाहरी कर्मों द्वारा समण नहीं है। संसार व्यर्थता में आनंदित होता है, तथागत (बुद्ध) व्यर्थता से मुक्त हैं।

अंग्रेजी अनुवाद: एफ. मैक्स मुलर (1881)। स्रोत

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