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धम्मपद 16.5

स्नेह से दुःख आता है, स्नेह से भय आता है; जो स्नेह से मुक्त है, वह न तो दुःख जानता है और न ही भय।

अनुवाद: एफ. मैक्स मुलर (1881)। स्रोत

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यह श्लोक आपके भीतर क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से ग्रहण करते हैं और आपके अपने मार्ग का सम्मान करते हैं।

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