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धम्मपद 15.5

विजय घृणा को जन्म देती है, क्योंकि पराजित दुःखी रहता है। जिसने विजय और पराजय दोनों को त्याग दिया है, वह संतुष्ट और सुखी है।

अंग्रेजी अनुवाद: F. Max Müller (1881)। स्रोत

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