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धम्मपद 14.2

वह जिसे इच्छा अपने जाल और विषों के साथ भटका नहीं सकती, उसे किस पथ पर ले जाओगे तुम, जागृत को, सर्वज्ञ को, पथहीन को?

अंग्रेज़ी अनुवाद: एफ. मैक्स मूलर (1881)। स्रोत

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यह श्लोक आपमें क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से लेते हैं और आपके अपने पथ का सम्मान करते हैं।

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