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धम्मपद 14.1

जिसकी विजय फिर से जीती नहीं जाती, जिसकी विजय में इस संसार में कोई प्रवेश नहीं करता, आप उस बोधित, सर्वज्ञ, निरपथ को किस पथ पर ले जा सकते हैं?

अनुवाद: F. Max Müller (1881)। स्रोत

आनंद के साथ इस श्लोक पर ध्यान करें

यह श्लोक आपके भीतर क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से ज्ञान लेते हैं और आपके अपने पथ का सम्मान करते हैं।

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