मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ||१८-६५||
manmanā bhava madbhakto madyājī māṃ namaskuru .
māmevaiṣyasi satyaṃ te pratijāne priyo.asi me ||18-65||
अपने मन को मुझ पर दृढ़ करो, मेरे भक्त बनो, मुझे समर्पित रहो, मुझे नमस्कार करो। तुम निश्चित ही मेरे पास आओगे; मैं तुम्हें सच्चा वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मेरे प्रिय हो।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्दों के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
18.65 मन्मनाः मुझ पर मन निश्चित करके? भव बनो? मद्भक्तः मेरे भक्त? मद्याजी मेरे लिए यज्ञ करो? माम् मुझे? नमस्कुरु नमस्कार करो? माम् मुझे? एव निश्चित ही? एष्यसि आओगे? सत्यम् सत्य? ते तुम्हें? प्रतिजाने प्रतिज्ञा देता हूँ? प्रियः प्रिय? असि हो? मे मेरे।व्याख्या - मन की एकाग्रता विकसित करो। अपने विचारों को मुझ पर केंद्रित करो। यदि मन भटकता है तो उसे बार-बार केंद्र पर लाओ; निरंतर अभ्यास से। अपने सभी कर्मों को मुझे समर्पित करो। अपनी जीभ से मेरा नाम बोलो। अपने हाथों से मेरे लिए काम करो। अपने पैरों से मेरे लिए चलो। सभी कर्म मेरे लिए हों। किसी भी प्राणी से घृणा छोड़ दो। मुझे नमस्कार करो। तब तुम मुझे प्राप्त करोगे।भगवान अर्जुन को अपना निश्चित वचन और गंभीर प्रतिज्ञा देते हैं। मेरी कृपा पाकर तुम मेरा पूर्ण ज्ञान प्राप्त करोगे और वह स्वयं ही तुम्हें मेरे साथ समरस कर देगा।हे अर्जुन, केवल मुझे ही अपना लक्ष्य और एकमात्र शरण समझकर, तुम निश्चित ही मेरे पास आओगे।भगवान के वचनों पर विश्वास करो और एक दृढ़ प्रतिज्ञा लो। भगवान को अपनी एकमात्र शरण बनाओ। तुम अंतिम मुक्ति प्राप्त करोगे।भक्ति का रहस्य भगवान को अपनी एकमात्र शरण बनाना है। अगले श्लोक में भगवान आत्मसमर्पण का सार बताते हैं। (cf.IX.34XII.8)
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18.65 मन्मनाः मुझ पर मन निश्चित करके? भव बनो? मद्भक्तः मेरे भक्त? मद्याजी मेरे लिए यज्ञ करो? माम् मुझे? नमस्कुरु नमस्कार करो? माम् मुझे? एव निश्चित ही? एष्यसि आओगे? सत्यम् सत्य? ते तुम्हें? प्रतिजाने प्रतिज्ञा देता हूँ? प्रियः प्रिय? असि हो? मे मेरे।व्याख्या - मन की एकाग्रता विकसित करो। अपने विचारों को मुझ पर केंद्रित करो। यदि मन भटकता है तो उसे बार-बार केंद्र पर लाओ; निरंतर अभ्यास से। अपने सभी कर्मों को मुझे समर्पित करो। अपनी जीभ से मेरा नाम बोलो। अपने हाथों से मेरे लिए काम करो। अपने पैरों से मेरे लिए चलो। सभी कर्म मेरे लिए हों। किसी भी प्राणी से घृणा छोड़ दो। मुझे नमस्कार करो। तब तुम मुझे प्राप्त करोगे।भगवान अर्जुन को अपना निश्चित वचन और गंभीर प्रतिज्ञा देते हैं। मेरी कृपा पाकर तुम मेरा पूर्ण ज्ञान प्राप्त करोगे और वह स्वयं ही तुम्हें मेरे साथ समरस कर देगा।हे अर्जुन, केवल मुझे ही अपना लक्ष्य और एकमात्र शरण समझकर, तुम निश्चित ही मेरे पास आओगे।भगवान के वचनों पर विश्वास करो और एक दृढ़ प्रतिज्ञा लो। भगवान को अपनी एकमात्र शरण बनाओ। तुम अंतिम मुक्ति प्राप्त करोगे।भक्ति का रहस्य भगवान को अपनी एकमात्र शरण बनाना है। अगले श्लोक में भगवान आत्मसमर्पण का सार बताते हैं। (cf.IX.34XII.8)