हे अर्जुन, जो यज्ञ पुरस्कार की इच्छा से और दिखावे के लिए किया जाता है, उसे तू राजसिक यज्ञ समझ।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्द अर्थ उसी स्रोत से। स्रोत
17.12 अभिसंधाय फल की खोज में? तु निश्चित रूप से? फलम् फल? दम्भार्थम् दिखावे के लिए? अपि भी? च और? एव ही? यत् जो? इज्यते किया जाता है? भरतश्रेष्ठ हे भरतों में श्रेष्ठ? तम् उस? यज्ञम् यज्ञ? विद्धि जानो? राजसम् राजसिक। व्याख्या यदि कोई स्वर्ग? पुत्र? धन? या नाम और यश प्राप्त करने के लिए यज्ञ का प्रदर्शन करता है, तो वह राजसिक प्रकृति का यज्ञ है। इस प्रकार के यज्ञ को करने वाले का उद्देश्य अपने महत्व को बढ़ाना है? विश्व में अपने नाम को लोकप्रिय करना है? कुछ पुरस्कार प्राप्त करना है? स्वयं को एक महान? पवित्र और विद्वान व्यक्ति के रूप में दिखाना है? अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करना है? अपने गौरव के लिए। उसे आत्मज्ञान प्राप्त करने की कोई इच्छा नहीं है।
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17.12 अभिसंधाय फल की खोज में? तु निश्चित रूप से? फलम् फल? दम्भार्थम् दिखावे के लिए? अपि भी? च और? एव ही? यत् जो? इज्यते किया जाता है? भरतश्रेष्ठ हे भरतों में श्रेष्ठ? तम् उस? यज्ञम् यज्ञ? विद्धि जानो? राजसम् राजसिक। व्याख्या यदि कोई स्वर्ग? पुत्र? धन? या नाम और यश प्राप्त करने के लिए यज्ञ का प्रदर्शन करता है, तो वह राजसिक प्रकृति का यज्ञ है। इस प्रकार के यज्ञ को करने वाले का उद्देश्य अपने महत्व को बढ़ाना है? विश्व में अपने नाम को लोकप्रिय करना है? कुछ पुरस्कार प्राप्त करना है? स्वयं को एक महान? पवित्र और विद्वान व्यक्ति के रूप में दिखाना है? अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करना है? अपने गौरव के लिए। उसे आत्मज्ञान प्राप्त करने की कोई इच्छा नहीं है।