इस नरक का द्वार तीन प्रकार का है, जो आत्मा का विनाश करता है — काम, क्रोध और लोभ; इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत
16.21 त्रिविधम् तीन प्रकार का? नरकस्य नरक का? इदम् यह? द्वारम् द्वार? नाशनम् विनाशकारी? आत्मनः आत्मा का? कामः काम? क्रोधः क्रोध? तथा भी? लोभः लोभ? तस्मात् इसलिए? एतत् यह? त्रयम् तीन? त्यजेत् त्याग देना चाहिए।टिप्पणी काम, क्रोध और लोभ — ये राजमार्ग के डाकू हैं जो मनुष्य को नरक, दुःख या विषाद के अंधकार गर्त में गिरा देंगे। ये तीन दुःख के मूल स्रोत हैं। ये तीन नरक की सबसे निचली गहराइयों तक ले जाने वाले द्वार का गठन करते हैं। ये मन में शांति, भक्ति और ज्ञान के शत्रु हैं। जब ये बुरे विचार मन में उत्पन्न होते हैं, तो मनुष्य अपना संतुलन, समझ-बूझ और विवेक खो देता है और विभिन्न बुरे कर्म करता है।काम, क्रोध और लोभ आत्म-अंधता और अज्ञान का प्रतीक हैं, क्योंकि ब्रह्म या शुद्ध अमर आत्मा में कोई वासनाएँ, इच्छाएँ, क्रोध या लोभ नहीं होता है।Narakasya dvaram नरक का द्वार नरक तक ले जाने वाला द्वार। केवल इस द्वार में प्रवेश करने से ही आत्मा का विनाश हो जाता है, अर्थात् यह जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कोई सही प्रयास करने के योग्य नहीं है।चूँकि यह द्वार आत्म-विनाश का कारण बनता है, इसलिए हर व्यक्ति को इन तीनों बुराइयों का त्याग कर देना चाहिए। (तुलना करें III.47)अगले श्लोक में इन तीन बुराइयों को त्याग चुके मनुष्य की अत्यंत प्रशंसा की गई है।
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16.21 त्रिविधम् तीन प्रकार का? नरकस्य नरक का? इदम् यह? द्वारम् द्वार? नाशनम् विनाशकारी? आत्मनः आत्मा का? कामः काम? क्रोधः क्रोध? तथा भी? लोभः लोभ? तस्मात् इसलिए? एतत् यह? त्रयम् तीन? त्यजेत् त्याग देना चाहिए।टिप्पणी काम, क्रोध और लोभ — ये राजमार्ग के डाकू हैं जो मनुष्य को नरक, दुःख या विषाद के अंधकार गर्त में गिरा देंगे। ये तीन दुःख के मूल स्रोत हैं। ये तीन नरक की सबसे निचली गहराइयों तक ले जाने वाले द्वार का गठन करते हैं। ये मन में शांति, भक्ति और ज्ञान के शत्रु हैं। जब ये बुरे विचार मन में उत्पन्न होते हैं, तो मनुष्य अपना संतुलन, समझ-बूझ और विवेक खो देता है और विभिन्न बुरे कर्म करता है।काम, क्रोध और लोभ आत्म-अंधता और अज्ञान का प्रतीक हैं, क्योंकि ब्रह्म या शुद्ध अमर आत्मा में कोई वासनाएँ, इच्छाएँ, क्रोध या लोभ नहीं होता है।Narakasya dvaram नरक का द्वार नरक तक ले जाने वाला द्वार। केवल इस द्वार में प्रवेश करने से ही आत्मा का विनाश हो जाता है, अर्थात् यह जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कोई सही प्रयास करने के योग्य नहीं है।चूँकि यह द्वार आत्म-विनाश का कारण बनता है, इसलिए हर व्यक्ति को इन तीनों बुराइयों का त्याग कर देना चाहिए। (तुलना करें III.47)अगले श्लोक में इन तीन बुराइयों को त्याग चुके मनुष्य की अत्यंत प्रशंसा की गई है।