यदि तुम इस अभ्यास योग का भी अभ्यास करने में असमर्थ हो, तो मेरे कार्मों को करने में तत्पर रहो; मेरे लिए कार्मों को करते हुए भी तुम सिद्धि को प्राप्त करोगे।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
12.10 अभ्यासे अभ्यास में? अपि भी? असमर्थः असमर्थ? असि (तुम) हो? मत्कर्मपरमः मेरे कार्मों को करने में तत्पर? भव हो? मदर्थम् मेरे लिए? अपि भी? कर्माणि कार्य? कुर्वन् करते हुए? सिद्धिम् सिद्धि? अवाप्स्यसि तुम प्राप्त करोगे।टिप्पणी यदि तुम योग का अभ्यास किए बिना मेरे लिए कार्य करो, तब भी तुम सिद्धि को प्राप्त कर सकते हो। तुम पहले मन की शुद्धि प्राप्त करोगे, फिर योग (एकाग्रता और ध्यान), फिर ज्ञान और अंत में मुक्ति (मोक्ष या मुक्ति)। नारायण भाव के साथ मानवता की सेवा करना (यह अनुभव करना कि आप सभी में भगवान की सेवा कर रहे हैं) भी भगवान के लिए कार्य करना है। ऐसी सेवा को भगवान की पूजा और ध्यान के साथ चलना चाहिए।यदि आप श्लोक 8 में वर्णित ध्यान योग या श्लोक 9 में वर्णित निरंतर अभ्यास योग का अभ्यास नहीं कर सकते, तो भगवान की भक्त-संचालित धार्मिक प्रवचनों को सुनकर भगवान से जुड़ी महिमामय कहानियां सुनें, कीर्तन गाएं और भगवान की प्रशंसा करें।भागवत धर्म की नौ प्रकार की साधनाओं का अभ्यास करें (भक्ति की नौ प्रकार की विधियां)। अर्थात्, (1) भगवान की लीलाओं को सुनना (श्रवण), (2) उनके नामों का गान (कीर्तन), (3) भगवान का निरंतर स्मरण और उनके नामों या मंत्रों का निरंतर पाठ (स्मरण), (4) उनके चरणों की सेवा (पादसेवन), (5) पूजा में फूल अर्पित करना (अर्चन), (6) भगवान को प्रणाम करना (वंदन), (7) उनका सेवक बनना (दास्य), (8) उनके साथ मित्रता (साख्य), और (9) भगवान के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण करना (आत्मनिवेदन)। (cf.III.19XI.55)
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12.10 अभ्यासे अभ्यास में? अपि भी? असमर्थः असमर्थ? असि (तुम) हो? मत्कर्मपरमः मेरे कार्मों को करने में तत्पर? भव हो? मदर्थम् मेरे लिए? अपि भी? कर्माणि कार्य? कुर्वन् करते हुए? सिद्धिम् सिद्धि? अवाप्स्यसि तुम प्राप्त करोगे।टिप्पणी यदि तुम योग का अभ्यास किए बिना मेरे लिए कार्य करो, तब भी तुम सिद्धि को प्राप्त कर सकते हो। तुम पहले मन की शुद्धि प्राप्त करोगे, फिर योग (एकाग्रता और ध्यान), फिर ज्ञान और अंत में मुक्ति (मोक्ष या मुक्ति)। नारायण भाव के साथ मानवता की सेवा करना (यह अनुभव करना कि आप सभी में भगवान की सेवा कर रहे हैं) भी भगवान के लिए कार्य करना है। ऐसी सेवा को भगवान की पूजा और ध्यान के साथ चलना चाहिए।यदि आप श्लोक 8 में वर्णित ध्यान योग या श्लोक 9 में वर्णित निरंतर अभ्यास योग का अभ्यास नहीं कर सकते, तो भगवान की भक्त-संचालित धार्मिक प्रवचनों को सुनकर भगवान से जुड़ी महिमामय कहानियां सुनें, कीर्तन गाएं और भगवान की प्रशंसा करें।भागवत धर्म की नौ प्रकार की साधनाओं का अभ्यास करें (भक्ति की नौ प्रकार की विधियां)। अर्थात्, (1) भगवान की लीलाओं को सुनना (श्रवण), (2) उनके नामों का गान (कीर्तन), (3) भगवान का निरंतर स्मरण और उनके नामों या मंत्रों का निरंतर पाठ (स्मरण), (4) उनके चरणों की सेवा (पादसेवन), (5) पूजा में फूल अर्पित करना (अर्चन), (6) भगवान को प्रणाम करना (वंदन), (7) उनका सेवक बनना (दास्य), (8) उनके साथ मित्रता (साख्य), और (9) भगवान के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण करना (आत्मनिवेदन)। (cf.III.19XI.55)