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ध्यान 7.42

जो भी वस्तु हमारी विवेकशील और सामाजिक शक्ति को मिलती है, यदि वह विवेक की संतुष्टि अथवा करुणा के अभ्यास के लिए कुछ न देती हो, तो वह सत्य में स्वयं को इससे अयोग्य समझती है।

अंग्रेजी अनुवाद: मेरिक कास्बॉन (1634)। स्रोत

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