भविष्य की बातों को वर्तमान न मानो, पर जो वस्तुएँ वर्तमान में हैं, उनमें से कुछ को अलग रखकर विचार करो, कि तुम उनसे कितना लाभ उठाते हो, और सोचो कि यदि वे वर्तमान में न होतीं तो तुम उनकी कितनी कामना करते। किंतु इस बात का ध्यान रखो कि वर्तमान वस्तुओं में संतुष्टि बनाते समय तुम उन्हें इतना मूल्यवान न समझ जाओ कि उनके अभाव से तुम्हें संकट और कष्ट हो। अपने आप में लीन हो जाओ। तुम्हारे विवेक शक्ति का यह स्वभाव है कि यदि वह न्याय का पालन करे और इससे अपने भीतर शांति प्राप्त करे, तो वह किसी अन्य वस्तु के बिना ही पूर्णतः संतुष्ट रहती है।