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धम्मपद 18.21

आकाश में कोई मार्ग नहीं है, कोई व्यक्ति बाहरी कार्यों से संन्यासी नहीं बनता। कोई प्राणी शाश्वत नहीं है; परंतु जागृत (बुद्ध) कभी नहीं हिलते।

अंग्रेजी अनुवाद: F. Max Müller (1881). स्रोत

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यह श्लोक आपमें क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से लेते हैं और आपके अपने पथ का सम्मान करते हैं।

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