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धम्मपद 17.1

कोई व्यक्ति क्रोध को छोड़ दे, अहंकार का परित्याग करे, सभी बंधनों को जीत ले! जो व्यक्ति नाम और रूप से आसक्त नहीं है, और जो कुछ भी अपना नहीं मानता, उसे कोई दुःख नहीं आता।

अंग्रेजी अनुवाद: F. Max Müller (1881)। स्रोत

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