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धम्मपद 14.9

स्वर्गीय सुखों में भी जो शिष्य पूरी तरह जाग्रत है वह संतुष्टि नहीं पाता, वह केवल सभी कामनाओं के विनाश में ही आनंद पाता है।

अंग्रेजी अनुवाद: F. Max Müller (1881)। स्रोत

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यह श्लोक आपके मन में क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से ज्ञान लेते हैं और आपके अपने मार्ग का सम्मान करते हैं।

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