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धम्मपद 1.8

जो आनंदों की खोज किए बिना जीता है, जिसकी इंद्रियां सुनियंत्रित हैं, अपने भोजन में मितव्ययी है, विश्वासयोग्य और दृढ़ है, उसे मार निश्चित रूप से नहीं गिरा सकता, जैसे हवा एक चट्टानी पर्वत को नहीं गिरा सकती।

अंग्रेजी अनुवाद: F. Max Müller (1881)। स्रोत

आनंद के साथ इस श्लोक पर विचार करें

यह श्लोक आपके मन में क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से लेते हैं और आपके अपने मार्ग का सम्मान करते हैं।

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