बेहतर अनुभव के लिए One Source Sangha को इंस्टॉल करें

भगवद्गीता 9.7

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् | कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ||९-७||
sarvabhūtāni kaunteya prakṛtiṃ yānti māmikām . kalpakṣaye punastāni kalpādau visṛjāmyaham ||9-7||
हे अर्जुन, कल्प के अंत में सभी प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं; मैं उन्हें अगले कल्प के आरंभ में फिर से प्रकट करता हूँ।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत

9.7 सर्वभूतानि सभी प्राणी? कौन्तेय हे कौन्तेय? प्रकृतिम् प्रकृति में? यान्ति जाते हैं? मामिकाम् मेरी? कल्पक्षये कल्प के अंत में? पुनः पुनः? तानि उन्हें? कल्पादौ कल्प के आरंभ में? विसृजामि प्रकट करता हूँ? अहम् मैं।टिप्पणी प्रकृति निम्न या आंतरिक प्रकृति जो तीन गुणों से बनी है? सत्त्व? रजस् और तमस्।जैसे घास पृथ्वी से उगती है और पृथ्वी में सूख जाती है, जैसे लहरें और तरंगें महासागर से उठती हैं और महासागर में ही विलीन हो जाती हैं, जैसे स्वप्न मन से उत्पन्न होते हैं और जब स्वप्नदर्शक जागता है तो मन में ही समा जाते हैं, उसी प्रकार प्रकृति से उत्पन्न प्राणी विसर्जन या प्रलय के समय इसमें विलीन हो जाते हैं।प्रलय विसर्जन की अवधि है। महाउत्पत्ति सृष्टि का समय है। (देखें VIII.18–19)

इस श्लोक पर Ananda के साथ चिंतन करें

यह श्लोक आपके अंदर क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — Ananda कई परंपराओं से ज्ञान लेता है और आपके अपने मार्ग का सम्मान करता है।

हमारे साथ चलें

एक मार्ग, एक प्रश्न, हर रविवार को। कुछ और नहीं, कभी नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी