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भगवद् गीता 9.4

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना | मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ||९-४||
mayā tatamidaṃ sarvaṃ jagadavyaktamūrtinā . matsthāni sarvabhūtāni na cāhaṃ teṣvavasthitaḥ ||9-4||
यह सम्पूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त रूप से व्याप्त है; सभी प्राणी मुझ में विद्यमान हैं, किंतु मैं उनमें निवास नहीं करता।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत

9.4 मया मेरे द्वारा? ततम् व्याप्त? इदम् यह? सर्वम् सब? जगत् जगत्? अव्यक्तमूर्तिना अव्यक्त रूप से? मत्स्थानि मुझ में विद्यमान? सर्वभूतानि सभी प्राणी? न नहीं? च और? अहम् मैं? तेषु उनमें? अवस्थितः स्थित।व्याख्या अव्यक्तमूर्ति परब्रह्म या सर्वोच्च अव्यक्त सत्ता है जो इंद्रियों को दृश्य नहीं है किंतु अंतर्ज्ञान द्वारा ज्ञेय है। ब्रह्मा सृष्टिकर्ता से लेकर घास के एक तिनके या चींटी तक सभी प्राणी ब्रह्मांडीय परब्रह्म में वास करते हैं। उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है वे उस आत्मा के माध्यम से विद्यमान हैं जो सभी चीजों का आधार है।यहाँ कुछ भी इसे समाहित नहीं कर सकता। चूंकि ब्रह्म सभी प्राणियों का आत्मा है कोई यह कल्पना कर सकता है कि यह उनमें वास करता है। किंतु ऐसा नहीं है। कैसे हो सकता है? अनंत को परिमित वस्तु में कैसे समाया जा सकता है? ब्रह्म का किसी भी भौतिक वस्तु से कोई संबंध या संपर्क नहीं है जैसे कि एक कुर्सी या टेबल का जमीन से या एक व्यक्ति या पुस्तक का संपर्क होता है। अतः यह उन प्राणियों में निवास नहीं करता। जिसका किसी भी वस्तु या प्राणी से कोई संबंध या संपर्क नहीं है वह किसी में भी समाहित नहीं हो सकता जैसे एक पात्र में एक बॉक्स में एक कक्ष में या एक कंटेनर में। आत्मा इन सभी रूपों में निहित नहीं है। यह किसी भी रूप में समाहित नहीं है जैसे कि आकाश किसी भी रूप में समाहित नहीं है हालांकि सभी रूप आकाश से व्युत्पन्न हैं।सभी प्राणी ब्रह्म में जीवित प्रतीत होते हैं किंतु यह एक भ्रम है। यदि यह भ्रम लुप्त हो जाए तो कहीं भी केवल ब्रह्म ही शेष रहता है। जब अज्ञान इस भ्रम का कारण लुप्त हो जाता है तो इन प्राणियों के अस्तित्व का विचार भी लुप्त हो जाएगा।श्लोक 4 और 5 में भगवान एक विरोधाभास या स्पष्ट विरोध का प्रयोग करते हैं। सभी प्राणी मुझ में निवास करते हैं और फिर भी मुझ में निवास नहीं करते। मैं उनमें निवास नहीं करता। एक चिंतक के लिए वास्तव में कोई विरोध नहीं है। जैसे आकाश सभी प्राणियों को समाहित करता है किंतु उनसे अछूता है वैसे ही परब्रह्म सभी कुछ को समाहित करता है किंतु उनसे अछूता है। यहां तक कि मूलप्रकृति इस जगत का स्रोत या गर्भ भी ब्रह्म द्वारा समर्थित है। ब्रह्म का कोई समर्थन या मूल नहीं है। यह अपनी निर्मल महिमा में विश्रांत है। (cf.VII.12,24VIII.22)

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