फिर पवित्र ब्राह्मण और भक्त राज-ऋषि कितनी आसानी से (लक्ष्य को) प्राप्त करते हैं; इस अनित्य और दुःखमय लोक में आकर, तुम मेरी भक्ति करो।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
9.33 किम् पुनः फिर कितना? ब्राह्मणाः ब्राह्मण? पुण्याः पवित्र? भक्ताः भक्त? राजर्षयः राज-ऋषि? तथा भी? अनित्यम् अनित्य? असुखम् दुःखमय? लोकम् लोक? इमम् यह? प्राप्य प्राप्त करके? भजस्व भक्ति करो? माम् मेरी।टिप्पणी राजर्षि वे राजा हैं जो राज्य के कर्तव्यों का पालन करते हुए संत बन गए हैं। मानव जन्म पाना बहुत कठिन है जो जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन है। इस मानव शरीर में पैदा होकर आपको प्रभु के प्रति भक्ति का जीवन जीना चाहिए। केवल मानव शरीर में ही आपके पास विचार करने की शक्ति (विचार शक्ति), विवेक और वैराग्य होगा। देवता भी मानव जन्म से ईष्या करते हैं। यह शरीर अनित्य है। यह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यह विभिन्न प्रकार के दर्द लाता है। तो इस शरीर के लिए सुख और आराम प्राप्त करने के प्रयासों को छोड़ दें। यदि मानव जन्म प्राप्त करने के बाद भी आप आत्म-साक्षात्कार का लक्ष्य नहीं रखते? तो आप व्यर्थ में जीवन जीते हैं, आप अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं और आप आत्मा के हत्यारे हैं। आप बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्र में फँस जाएँगे।
इस श्लोक पर आनंद के साथ चिंतन करें
यह श्लोक आपमें क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से जानकारी लेते हैं और आपके अपने मार्ग का सम्मान करते हैं।
9.33 किम् पुनः फिर कितना? ब्राह्मणाः ब्राह्मण? पुण्याः पवित्र? भक्ताः भक्त? राजर्षयः राज-ऋषि? तथा भी? अनित्यम् अनित्य? असुखम् दुःखमय? लोकम् लोक? इमम् यह? प्राप्य प्राप्त करके? भजस्व भक्ति करो? माम् मेरी।टिप्पणी राजर्षि वे राजा हैं जो राज्य के कर्तव्यों का पालन करते हुए संत बन गए हैं। मानव जन्म पाना बहुत कठिन है जो जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन है। इस मानव शरीर में पैदा होकर आपको प्रभु के प्रति भक्ति का जीवन जीना चाहिए। केवल मानव शरीर में ही आपके पास विचार करने की शक्ति (विचार शक्ति), विवेक और वैराग्य होगा। देवता भी मानव जन्म से ईष्या करते हैं। यह शरीर अनित्य है। यह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यह विभिन्न प्रकार के दर्द लाता है। तो इस शरीर के लिए सुख और आराम प्राप्त करने के प्रयासों को छोड़ दें। यदि मानव जन्म प्राप्त करने के बाद भी आप आत्म-साक्षात्कार का लक्ष्य नहीं रखते? तो आप व्यर्थ में जीवन जीते हैं, आप अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं और आप आत्मा के हत्यारे हैं। आप बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्र में फँस जाएँगे।