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भगवद् गीता 9.29

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः | ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ||९-२९||
samo.ahaṃ sarvabhūteṣu na me dveṣyo.asti na priyaḥ . ye bhajanti tu māṃ bhaktyā mayi te teṣu cāpyaham ||9-29||
मैं सभी प्राणियों के लिए समान हूँ; मेरे लिए कोई घृणित या प्रिय नहीं है; किंतु जो मेरी भक्ति से मेरी पूजा करते हैं, वे मुझ में हैं और मैं भी उनमें हूँ।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी सिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत

9.29 समः समान? अहम् मैं? सर्वभूतेषु सभी प्राणियों में? न नहीं? मे मेरे लिए? द्वेष्यः घृणित? अस्ति है? न नहीं? प्रियः प्रिय? ये जो? भजन्ति पूजा करते हैं? तु किंतु? माम् मुझे? भक्त्या भक्ति से? मयि मुझ में? ते वे? तेषु उनमें? च और? अपि भी? अहम् मैं।टिप्पणी भगवान को सभी के प्रति समान दृष्टिकोण है। वह सभी जीवों को समान मानते हैं। किसी को भी उन्होंने निंदित नहीं किया; किसी का भी पक्ष नहीं लिया। वह किसी के शत्रु नहीं हैं। वह किसी के आंशिक प्रेमी नहीं हैं। वह किसी का पक्ष लेते हैं और दूसरों पर कुपित नहीं होते। अहंकारी मनुष्य ने अपनी गलत मनोवृत्ति से ही अपने और परम सत्ता के बीच एक विशाल खाई बना ली है। भगवान उसके अपने श्वास से भी समीप हैं; उसके हाथ-पैर से भी निकटतर हैं।मैं अग्नि के समान हूँ। जिस प्रकार अग्नि उन लोगों की सर्दी दूर करती है जो उसके पास जाते हैं, लेकिन जो दूर रहते हैं उनकी नहीं; वैसे ही मैं अपने भक्तों पर अपनी कृपा बरसाता हूँ, लेकिन यह मेरे किसी प्रकार के आसक्ति के कारण नहीं है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश सर्वत्र व्याप्त है, किंतु वह केवल स्वच्छ दर्पण में ही परावर्तित होता है, बर्तन में नहीं; वैसे ही मैं, परम प्रभु, सर्वत्र विद्यमान हूँ, किंतु केवल उन्हीं व्यक्तियों में प्रकट होता हूँ जिनके मन से (अज्ञान के कारण जमा हुई) सभी प्रकार की अशुद्धियाँ उनकी भक्ति से दूर हो गई हों।सूर्य को दर्पण से न तो प्रेम है और न ही बर्तन से घृणा। कल्पवृक्ष को लोगों से न तो प्रेम है और न ही घृणा। यह केवल उन्हीं को वांछित वस्तुएँ प्रदान करता है जो उसके पास जाते हैं। (तुलना करें VII.17XII.14और20)अब मेरी भक्ति की महिमा सुनें।

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