वह परम पुरुष, हे अर्जुन, केवल उसी के प्रति अटल भक्ति से प्राप्य है जिसके भीतर सभी प्राणी निवास करते हैं और जिससे यह सब कुछ व्याप्त है।
अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्द के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
8.22 पुरुषः पुरुष? सः वह? परः परम? पार्थ हे पार्थ? भक्त्या भक्ति से? लभ्यः प्राप्य है? तु वास्तव में? अनन्यया दूसरे वस्तु के बिना (अटल)? यस्य किसका? अन्तःस्थानि भीतर निवास करते? भूतानि प्राणी? येन जिससे? सर्वम् सब? इदम् यह? ततम् व्याप्त है।टिप्पणी सभी प्राणी (प्रभाव) पुरुष (परम व्यक्तित्व? कारण) के भीतर निवास करते हैं क्योंकि हर प्रभाव अपने कारण में विश्राम करता है। जैसे प्रभाव घड़ा अपने कारण मिट्टी में विश्राम करता है, वैसे ही सभी प्राणी और लोक अपने कारण पुरुष में विश्राम करते हैं। इसलिए संपूर्ण विश्व पुरुष द्वारा व्याप्त है।श्री शंकर अनन्य भक्ति की व्याख्या आत्मज्ञान या आत्म-ज्ञान के रूप में करते हैं।पुरुष को इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह सब कुछ से भरा है (संस्कृत मूल पुर से व्युत्पन्न जिसका अर्थ भरना है) या क्योंकि यह सब के शरीर में विश्राम करता है (संस्कृत मूल पुर से व्युत्पन्न)। कोई भी इससे उच्चतर नहीं है और इसलिए यह परम व्यक्तित्व है। (देखें IX.4XI.38XV.6और7)
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8.22 पुरुषः पुरुष? सः वह? परः परम? पार्थ हे पार्थ? भक्त्या भक्ति से? लभ्यः प्राप्य है? तु वास्तव में? अनन्यया दूसरे वस्तु के बिना (अटल)? यस्य किसका? अन्तःस्थानि भीतर निवास करते? भूतानि प्राणी? येन जिससे? सर्वम् सब? इदम् यह? ततम् व्याप्त है।टिप्पणी सभी प्राणी (प्रभाव) पुरुष (परम व्यक्तित्व? कारण) के भीतर निवास करते हैं क्योंकि हर प्रभाव अपने कारण में विश्राम करता है। जैसे प्रभाव घड़ा अपने कारण मिट्टी में विश्राम करता है, वैसे ही सभी प्राणी और लोक अपने कारण पुरुष में विश्राम करते हैं। इसलिए संपूर्ण विश्व पुरुष द्वारा व्याप्त है।श्री शंकर अनन्य भक्ति की व्याख्या आत्मज्ञान या आत्म-ज्ञान के रूप में करते हैं।पुरुष को इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह सब कुछ से भरा है (संस्कृत मूल पुर से व्युत्पन्न जिसका अर्थ भरना है) या क्योंकि यह सब के शरीर में विश्राम करता है (संस्कृत मूल पुर से व्युत्पन्न)। कोई भी इससे उच्चतर नहीं है और इसलिए यह परम व्यक्तित्व है। (देखें IX.4XI.38XV.6और7)