avyakto.akṣara ityuktastamāhuḥ paramāṃ gatim .
yaṃ prāpya na nivartante taddhāma paramaṃ mama ||8-21||
जिसे अव्यक्त और अक्षर कहा जाता है, उसे वे परम लक्ष्य कहते हैं। जो उसे प्राप्त कर लेते हैं, वे इस संसार में नहीं लौटते। वह मेरा परम धाम है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
8.21 अव्यक्तः अप्रकट? अक्षरः अविनाशी? इति इस प्रकार? उक्तः कहा जाता है? तम् उसे? आहुः (वे) कहते हैं? परमाम् परम? गतिम् लक्ष्य (मार्ग)? यम् जिसे? प्राप्य प्राप्त करके? न नहीं? निवर्तन्ते लौटते हैं? तत् वह? धाम धाम (स्थान या अवस्था)? परमम् परम? मम मेरा।टिप्पणी परब्रह्मन को अव्यक्त इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसे इंद्रियों द्वारा नहीं समझा जा सकता। इसे अविनाशी भी कहा जाता है। यह सर्वव्यापी? सर्वपरिव्याप्त और सर्वांतर्यामी है। परब्रह्मन परम लक्ष्य है। इससे कुछ भी उच्चतर नहीं है। यह सत्य अद्वैत अवस्था है जो सभी प्रकार की सीमित आवृत्तियों से मुक्त है। ब्रह्मलोक (सृष्टिकर्ता का क्षेत्र) आदि की प्राप्ति इससे निम्नतर है। केवल आत्म-साक्षात्कार द्वारा ही व्यक्ति संसार से मुक्त होता है। (देखें XII.3?XV.6)
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8.21 अव्यक्तः अप्रकट? अक्षरः अविनाशी? इति इस प्रकार? उक्तः कहा जाता है? तम् उसे? आहुः (वे) कहते हैं? परमाम् परम? गतिम् लक्ष्य (मार्ग)? यम् जिसे? प्राप्य प्राप्त करके? न नहीं? निवर्तन्ते लौटते हैं? तत् वह? धाम धाम (स्थान या अवस्था)? परमम् परम? मम मेरा।टिप्पणी परब्रह्मन को अव्यक्त इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसे इंद्रियों द्वारा नहीं समझा जा सकता। इसे अविनाशी भी कहा जाता है। यह सर्वव्यापी? सर्वपरिव्याप्त और सर्वांतर्यामी है। परब्रह्मन परम लक्ष्य है। इससे कुछ भी उच्चतर नहीं है। यह सत्य अद्वैत अवस्था है जो सभी प्रकार की सीमित आवृत्तियों से मुक्त है। ब्रह्मलोक (सृष्टिकर्ता का क्षेत्र) आदि की प्राप्ति इससे निम्नतर है। केवल आत्म-साक्षात्कार द्वारा ही व्यक्ति संसार से मुक्त होता है। (देखें XII.3?XV.6)