जो योगी निरन्तर केवल मुझ को ही स्मरण करता है, उस नित्य-युक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ, हे पार्थ। वह दूसरी किसी बात का चिन्तन नहीं करता (एकाग्र मन वाला है)।
अनुवाद: स्वामी शिवानन्द (1942) · नीचे शब्दों के अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत
8.14 अनन्यचेताः जिसका मन किसी अन्य विषय का चिन्तन नहीं करता? सततम् निरन्तर? यः जो? माम् मुझे? स्मरति स्मरण करता है? नित्यशः प्रतिदिन? तस्य उसका? अहम् मैं? सुलभः सुलभ (आसानी से प्राप्य)? पार्थ हे पार्थ? नित्ययुक्तस्य नित्य-युक्त? योगिनः योगी को।टिप्पणी जो योगी भगवान् को निरन्तर और प्रतिदिन स्मरण करता है, वह भगवान् को सुलभता से प्राप्त कर सकता है। दूसरी किसी बात का चिन्तन नहीं करता (एकाग्र मन वाला है)। टिप्पणी पूरे जीवन भर भगवान् को निरन्तर स्मरण करना ही उनको प्राप्त करने का सबसे आसान तरीका है।अनन्यचेताः उसका किसी अन्य विषय में कोई आसक्ति नहीं है। वह अपने इष्टदेव के अतिरिक्त किसी अन्य के बारे में नहीं सोचेगा।नित्यशः लम्बे समय तक; अर्थात् जीवन के अन्त तक।जो योगी कभी-कभी या छः महीने भगवान् को स्मरण करे, फिर साधना छोड़ दे और फिर छः महीने बाद दोबारा शुरू करे, वह उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता। (देखें IX.22?34)
इस श्लोक पर आनंद के साथ ध्यान करें
यह श्लोक आपको क्या अनुभव कराता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से लेते हैं और आपके अपने मार्ग को सम्मान देते हैं।
8.14 अनन्यचेताः जिसका मन किसी अन्य विषय का चिन्तन नहीं करता? सततम् निरन्तर? यः जो? माम् मुझे? स्मरति स्मरण करता है? नित्यशः प्रतिदिन? तस्य उसका? अहम् मैं? सुलभः सुलभ (आसानी से प्राप्य)? पार्थ हे पार्थ? नित्ययुक्तस्य नित्य-युक्त? योगिनः योगी को।टिप्पणी जो योगी भगवान् को निरन्तर और प्रतिदिन स्मरण करता है, वह भगवान् को सुलभता से प्राप्त कर सकता है। दूसरी किसी बात का चिन्तन नहीं करता (एकाग्र मन वाला है)। टिप्पणी पूरे जीवन भर भगवान् को निरन्तर स्मरण करना ही उनको प्राप्त करने का सबसे आसान तरीका है।अनन्यचेताः उसका किसी अन्य विषय में कोई आसक्ति नहीं है। वह अपने इष्टदेव के अतिरिक्त किसी अन्य के बारे में नहीं सोचेगा।नित्यशः लम्बे समय तक; अर्थात् जीवन के अन्त तक।जो योगी कभी-कभी या छः महीने भगवान् को स्मरण करे, फिर साधना छोड़ दे और फिर छः महीने बाद दोबारा शुरू करे, वह उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता। (देखें IX.22?34)