One Source Sangha को बेहतर अनुभव के लिए इंस्टॉल करें

भगवद्गीता 8.13

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् | यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ||८-१३||
omityekākṣaraṃ brahma vyāharanmāmanusmaran . yaḥ prayāti tyajandehaṃ sa yāti paramāṃ gatim ||8-13||
एक-अक्षर ओम् — ब्रह्म का उच्चारण करते हुए, मुझे स्मरण करते हुए, जो शरीर को त्याग कर प्रस्थान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत

8.13 Om— इति इस प्रकार? एकाक्षरम्— एक-अक्षर? ब्रह्म— ब्रह्म? व्याहरन्— का उच्चारण करते हुए? माम्— मुझे? अनुस्मरन्— स्मरण करते हुए? यः— जो? प्रयाति— प्रस्थान करता है? त्यजन्— त्याग करते हुए? देहम्— शरीर को? सः— वह? याति— प्राप्त होता है? परमाम्— परम? गतिम्— गति को। टिप्पणी योगी ने विचारों को नियंत्रित करके सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से ऊपर की ओर आरोहण किया। वह अपनी संपूर्ण प्राण या जीवन-श्वास को सिर के शीर्ष पर ब्रह्मरन्ध्र या ब्रह्म के छिद्र में स्थिर करता है। वह पवित्र एक-अक्षर ओम् का उच्चारण करता है, मुझ पर ध्यान करता है और शरीर को त्याग देता है।

इस श्लोक पर Ananda के साथ विचार करें

यह श्लोक आपके हृदय में क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — Ananda कई परंपराओं से आहरण करता है और आपके अपने मार्ग को सम्मानित करता है।

हमारे साथ चलें

एक परिच्छेद, एक प्रश्न, हर रविवार। और कुछ नहीं, कभी नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी