मैं पृथ्वी में मधुर सुगंध हूँ और अग्नि में तेज हूँ, सभी प्राणियों में जीवन हूँ, और तपस्वियों में तपस्या हूँ।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी सिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ भी उसी स्रोत से हैं। स्रोत
7.9 पुण्यः मधुर · गन्धः सुगंध · पृथिव्याम् पृथ्वी में · च और · तेजः तेज · च और · अस्मि हूँ (मैं) · विभावसौ अग्नि में · जीवनम् जीवन · सर्वभूतेषु सभी प्राणियों में · तपः तपस्या · च और · अस्मि हूँ (मैं) · तपस्विषु तपस्वियों में।टिप्पणी मुझमें पृथ्वी की गंध के रूप में, मुझमें अग्नि का तेज के रूप में, मुझमें सभी प्राणियों का जीवन के रूप में, मुझमें सभी तपस्वियों की तपस्या के रूप में बुना हुआ है। मैं सब कुछ का आधार हूँ। मैं वह शक्ति हूँ जो तपस्वियों को मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने में मदद करती है। कृष्ण कहते हैं, मैं सुखद गंध हूँ। यदि अर्जुन ने उनसे पूछा होता, तो अप्रिय गंध कौन है? तो वे उत्तर देते, वह भी मैं हूँ।
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यह श्लोक आपमें क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से आहरण करता है और आपके अपने मार्ग का सम्मान करता है।
7.9 पुण्यः मधुर · गन्धः सुगंध · पृथिव्याम् पृथ्वी में · च और · तेजः तेज · च और · अस्मि हूँ (मैं) · विभावसौ अग्नि में · जीवनम् जीवन · सर्वभूतेषु सभी प्राणियों में · तपः तपस्या · च और · अस्मि हूँ (मैं) · तपस्विषु तपस्वियों में।टिप्पणी मुझमें पृथ्वी की गंध के रूप में, मुझमें अग्नि का तेज के रूप में, मुझमें सभी प्राणियों का जीवन के रूप में, मुझमें सभी तपस्वियों की तपस्या के रूप में बुना हुआ है। मैं सब कुछ का आधार हूँ। मैं वह शक्ति हूँ जो तपस्वियों को मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने में मदद करती है। कृष्ण कहते हैं, मैं सुखद गंध हूँ। यदि अर्जुन ने उनसे पूछा होता, तो अप्रिय गंध कौन है? तो वे उत्तर देते, वह भी मैं हूँ।