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भगवद्गीता 7.6

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय | अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ||७-६||
etadyonīni bhūtāni sarvāṇītyupadhāraya . ahaṃ kṛtsnasya jagataḥ prabhavaḥ pralayastathā ||7-6||
जान लो कि ये दोनों (प्रकृतियाँ) सभी प्राणियों की योनि हैं। इसलिए मैं संपूर्ण ब्रह्मांड का स्रोत और विलय हूँ।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्द अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत

7.6 एतद्योनीनि इन दोनों (प्रकृतियों) की योनि कौन सी है? भूतानि प्राणी? सर्वाणि सभी? इति इस प्रकार? उपधारय जान लो? अहम् मैं? कृत्स्नस्य संपूर्ण? जगतः विश्व का? प्रभवः स्रोत? प्रलयः विलय? तथा भी।टिप्पणी ये दोनों प्रकृतियाँ - अप्रकृति और परप्रकृति - सभी प्राणियों की योनि हैं। चूँकि मैं इन दोनों प्रकृतियों का भी स्रोत हूँ, मैं इस ब्रह्मांड का कारण हूँ। संपूर्ण ब्रह्मांड मुझ से उत्पन्न होता है और मुझ में विलय हो जाता है।ब्रह्मसूत्रों (अध्याय 1, खंड 1, सूत्र 2) में कहा गया है कि ब्रह्मन् वह सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान कारण है जिससे इस विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और विलय होते हैं।जैसे स्वप्न में मन स्वप्न के दृश्यों का भौतिक कारण (उपादान कारण) और दर्शक (द्रष्टा) दोनों है, वैसे ही ईश्वर इस जगत का भौतिक कारण (उपादान कारण) और दर्शक (द्रष्टा) दोनों है। वह निमित्त कारण (instrumental cause) भी है। (देखें XIV.3)

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