यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति |
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ||७-२१||
yo yo yāṃ yāṃ tanuṃ bhaktaḥ śraddhayārcitumicchati .
tasya tasyācalāṃ śraddhāṃ tāmeva vidadhāmyaham ||7-21||
जो कोई भी भक्त किसी भी रूप की श्रद्धा के साथ पूजा करना चाहता है, मैं उसकी उसी श्रद्धा को दृढ़ और अटूट बनाता हूँ।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
7.21 यः कौन? यः कौन? याम् कौन सा? याम् कौन सा? तनुम् रूप? भक्तः भक्त? श्रद्धया श्रद्धा के साथ? अर्चितुम् पूजा करना? इच्छति चाहता है? तस्य तस्य उसका? अचलाम् अटूट? श्रद्धाम् श्रद्धा? ताम् वह? एव निश्चित रूप से? विदधामि बनाता हूँ? अहम् मैं। व्याख्या तनु या शरीर यहाँ देवता (देव) के अर्थ में प्रयुक्त है। भगवान् सभी प्राणियों के अंतर्यामी छोटे देवताओं की पूजा करने वाले उस भक्त की श्रद्धा को दृढ़ और अडिग बनाते हैं, जो उसके पूर्वजन्म के संस्कारों से उत्पन्न है। (देखें IV.11, IX.22 और 23)
अनंद के साथ इस श्लोक पर ध्यान करें
यह श्लोक आपके भीतर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — अनंद कई परंपराओं से आता है और आपके अपने मार्ग को सम्मानित करता है।
7.21 यः कौन? यः कौन? याम् कौन सा? याम् कौन सा? तनुम् रूप? भक्तः भक्त? श्रद्धया श्रद्धा के साथ? अर्चितुम् पूजा करना? इच्छति चाहता है? तस्य तस्य उसका? अचलाम् अटूट? श्रद्धाम् श्रद्धा? ताम् वह? एव निश्चित रूप से? विदधामि बनाता हूँ? अहम् मैं। व्याख्या तनु या शरीर यहाँ देवता (देव) के अर्थ में प्रयुक्त है। भगवान् सभी प्राणियों के अंतर्यामी छोटे देवताओं की पूजा करने वाले उस भक्त की श्रद्धा को दृढ़ और अडिग बनाते हैं, जो उसके पूर्वजन्म के संस्कारों से उत्पन्न है। (देखें IV.11, IX.22 और 23)