मन वास्तव में चंचल, अशांत, प्रबल और अटल है, हे कृष्ण: मुझे इसे नियंत्रित करना वायु को नियंत्रित करने जितना कठिन प्रतीत होता है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी सिवानंद (1942) · नीचे शब्द अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
6.34 चञ्चलम् चंचल? हि वास्तव में? मनः मन? कृष्ण हे कृष्ण? प्रमाथि अशांत? बलवत् प्रबल? दृढम् अटल? तस्य इसका? अहम् मैं? निग्रहम् नियंत्रण? मन्ये सोचता हूं? वायोः वायु का? इव जैसे? सुदुष्करम् करना कठिन।टिप्पणी मन निरंतर अपने विषयों को बदलता है और इसलिए यह हमेशा चंचल रहता है। कृष्ण क्रिश से व्युत्पन्न है जिसका अर्थ है खुरचना। वह अपने भक्तों के हृदय से सभी पापों, बुराइयों और बुराई के कारणों को खुरचते हैं। इसलिए उन्हें कृष्ण कहा जाता है। मन न केवल चंचल है बल्कि अशांत या उतावला भी है, प्रबल और जिद्दी है। यह शरीर और इंद्रियों में हिंसक कंपन पैदा करता है। मन सभी दिशाओं में वस्तुओं की ओर आकृष्ट होता है। यह हमेशा पाँच इंद्रियों के संयोजन में काम करता है। यह उन्हें पाँच प्रकार की वस्तुओं की ओर खींचता है। इसलिए यह हमेशा चंचल रहता है। यह इन इंद्रियों और शरीर की मदद से पाँच प्रकार की संवेदी वस्तुओं का आनंद लेता है। इसलिए यह उन्हें बाहरी प्रभावों के अधीन बनाता है। इसे वायु को नियंत्रित करने से भी अधिक कठिन है। मन वायु-तन्मात्र (वायु मूल तत्व) से पैदा होता है। यही कारण है कि यह वायु जितना चंचल है।
Ananda के साथ इस श्लोक पर विचार करें
यह श्लोक आपमें क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — Ananda कई परंपराओं से खींचता है और आपके अपने पथ का सम्मान करता है।
6.34 चञ्चलम् चंचल? हि वास्तव में? मनः मन? कृष्ण हे कृष्ण? प्रमाथि अशांत? बलवत् प्रबल? दृढम् अटल? तस्य इसका? अहम् मैं? निग्रहम् नियंत्रण? मन्ये सोचता हूं? वायोः वायु का? इव जैसे? सुदुष्करम् करना कठिन।टिप्पणी मन निरंतर अपने विषयों को बदलता है और इसलिए यह हमेशा चंचल रहता है। कृष्ण क्रिश से व्युत्पन्न है जिसका अर्थ है खुरचना। वह अपने भक्तों के हृदय से सभी पापों, बुराइयों और बुराई के कारणों को खुरचते हैं। इसलिए उन्हें कृष्ण कहा जाता है। मन न केवल चंचल है बल्कि अशांत या उतावला भी है, प्रबल और जिद्दी है। यह शरीर और इंद्रियों में हिंसक कंपन पैदा करता है। मन सभी दिशाओं में वस्तुओं की ओर आकृष्ट होता है। यह हमेशा पाँच इंद्रियों के संयोजन में काम करता है। यह उन्हें पाँच प्रकार की वस्तुओं की ओर खींचता है। इसलिए यह हमेशा चंचल रहता है। यह इन इंद्रियों और शरीर की मदद से पाँच प्रकार की संवेदी वस्तुओं का आनंद लेता है। इसलिए यह उन्हें बाहरी प्रभावों के अधीन बनाता है। इसे वायु को नियंत्रित करने से भी अधिक कठिन है। मन वायु-तन्मात्र (वायु मूल तत्व) से पैदा होता है। यही कारण है कि यह वायु जितना चंचल है।