यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ||६-३०||
yo māṃ paśyati sarvatra sarvaṃ ca mayi paśyati .
tasyāhaṃ na praṇaśyāmi sa ca me na praṇaśyati ||6-30||
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझ में देखता है, वह कभी मुझसे अलग नहीं होता, और न ही मैं उससे अलग होता हूँ।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
6.30 यः कौन? माम् मुझे? पश्यति देखता है? सर्वत्र सर्वत्र? सर्वम् सब? च और? मयि मुझ में? पश्यति देखता है? तस्य उसका? अहम् मैं? न नहीं? प्रणश्यामि नष्ट होता हूँ? सः वह? च और? मे मुझसे? न नहीं? प्रणश्यति नष्ट होता है।टिप्पणी इस श्लोक में भगवान आत्म-एकता या अद्वैत के दृष्टि के प्रभाव को वर्णित करते हैं। जो मुझे देखता है, सभी प्राणियों में आत्म को देखता है, और सब कुछ (ब्रह्मा निर्माता से लेकर घास के तिनके तक) मुझ में देखता है, वह मुझसे खो नहीं जाता है, और न ही वह मुझसे खो जाता है। मैं और आत्म-एकता का दर्शी समान या एक हो जाते हैं। मैं उसकी उपस्थिति से कभी अलग नहीं होता और न ही वह मेरी उपस्थिति से अलग होता है। मैं उससे कभी अपना पकड़ नहीं खोता और न ही वह मुझसे अपना पकड़ खोता है। मैं उसमें रहता हूँ और वह मुझ में रहता है।
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6.30 यः कौन? माम् मुझे? पश्यति देखता है? सर्वत्र सर्वत्र? सर्वम् सब? च और? मयि मुझ में? पश्यति देखता है? तस्य उसका? अहम् मैं? न नहीं? प्रणश्यामि नष्ट होता हूँ? सः वह? च और? मे मुझसे? न नहीं? प्रणश्यति नष्ट होता है।टिप्पणी इस श्लोक में भगवान आत्म-एकता या अद्वैत के दृष्टि के प्रभाव को वर्णित करते हैं। जो मुझे देखता है, सभी प्राणियों में आत्म को देखता है, और सब कुछ (ब्रह्मा निर्माता से लेकर घास के तिनके तक) मुझ में देखता है, वह मुझसे खो नहीं जाता है, और न ही वह मुझसे खो जाता है। मैं और आत्म-एकता का दर्शी समान या एक हो जाते हैं। मैं उसकी उपस्थिति से कभी अलग नहीं होता और न ही वह मेरी उपस्थिति से अलग होता है। मैं उससे कभी अपना पकड़ नहीं खोता और न ही वह मुझसे अपना पकड़ खोता है। मैं उसमें रहता हूँ और वह मुझ में रहता है।