जो मुनि योग को प्राप्त करने की इच्छा रखता है, उसके लिए कर्म साधन कहा जाता है; और जो मुनि योग में प्रतिष्ठित हो गया है, उसके लिए शम (निष्क्रियता) साधन कहा जाता है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत
6.3 आरुरुक्षोः आरोहण की इच्छा रखने वाले? मुनेः मुनि या ऋषि का? योगम् योग? कर्म कर्म? कारणम् कारण? उच्यते कहा जाता है? योगारूढस्य योग में प्रतिष्ठित व्यक्ति का? तस्य उसका? एव ही? शमः निष्क्रियता (शांति)? कारणम् कारण? उच्यते कहा जाता है।टिप्पणी जो मनुष्य लंबे समय तक ध्यान का अभ्यास नहीं कर सकता और जो अपने मन को ध्यान में स्थिर नहीं रख सकता, उसके लिए कर्म ही योग में स्थापित होने का साधन है। कर्म मन को शुद्ध करता है और मन को स्थिर ध्यान के अभ्यास के लिए योग्य बनाता है। कर्म से स्थिर एकाग्रता और ध्यान प्राप्त होता है।जो ऋषि योग में प्रतिष्ठित है, उसके लिए शम या कर्मों का त्याग साधन कहा जाता है।जितना अधिक वह कर्मों से दूर रहता है, उतना ही उसका मन स्थिर रहता है, और जितना अधिक वह शांत है, उतना ही उसका मन आत्मा में निष्ठित होता है। ब्राह्मण के लिए आत्म-ज्ञान, सत्यता, अच्छा चरित्र, दृढ़ता, अहिंसा, सरलता और सभी कर्मों का त्याग जैसा कोई धन नहीं है। (महाभारत, शांति पर्व, 175.38)
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6.3 आरुरुक्षोः आरोहण की इच्छा रखने वाले? मुनेः मुनि या ऋषि का? योगम् योग? कर्म कर्म? कारणम् कारण? उच्यते कहा जाता है? योगारूढस्य योग में प्रतिष्ठित व्यक्ति का? तस्य उसका? एव ही? शमः निष्क्रियता (शांति)? कारणम् कारण? उच्यते कहा जाता है।टिप्पणी जो मनुष्य लंबे समय तक ध्यान का अभ्यास नहीं कर सकता और जो अपने मन को ध्यान में स्थिर नहीं रख सकता, उसके लिए कर्म ही योग में स्थापित होने का साधन है। कर्म मन को शुद्ध करता है और मन को स्थिर ध्यान के अभ्यास के लिए योग्य बनाता है। कर्म से स्थिर एकाग्रता और ध्यान प्राप्त होता है।जो ऋषि योग में प्रतिष्ठित है, उसके लिए शम या कर्मों का त्याग साधन कहा जाता है।जितना अधिक वह कर्मों से दूर रहता है, उतना ही उसका मन स्थिर रहता है, और जितना अधिक वह शांत है, उतना ही उसका मन आत्मा में निष्ठित होता है। ब्राह्मण के लिए आत्म-ज्ञान, सत्यता, अच्छा चरित्र, दृढ़ता, अहिंसा, सरलता और सभी कर्मों का त्याग जैसा कोई धन नहीं है। (महाभारत, शांति पर्व, 175.38)