योगी, इस प्रकार सदैव मन को जोड़कर (योग का अभ्यास करते हुए), पापों से मुक्त होकर, ब्रह्म (सनातन) के संपर्श के अनंत आनंद का आसानी से आनंद लेता है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ समान स्रोत से। स्रोत
6.28 युञ्जन् योग का अभ्यास करते हुए? एवम् इस प्रकार? सदा सदैव? आत्मानम् आत्मा को? योगी योगी? विगतकल्मषः पाप से मुक्त? सुखेन आसानी से? ब्रह्मसंस्पर्शम् ब्रह्म के संपर्क से? अत्यन्तम् अनंत? सुखम् आनंद? अश्नुते आनंद लेता है।टिप्पणी योग साधनाओं जैसे इंद्रियों की निवृत्ति? एकाग्रता और ध्यान के द्वारा वह इंद्रियों की वस्तुओं के साथ संपर्क खो देता है और अपने भीतर ब्रह्म या अमर आत्मा के साथ संपर्क में आता है और इस प्रकार ब्रह्म के अनंत आनंद का आनंद लेता है।इंद्रिय सुख क्षणिक या अस्थायी होते हैं लेकिन ब्रह्म का आनंद निरंतर? अक्षय और शाश्वत होता है। इसी कारण से किसी को आत्मा को साकार करने का प्रयास करना चाहिए।योगी उन बाधाओं को दूर करता है जो प्रभु के साथ मिलन प्राप्त करने के रास्ते में खड़ी होती हैं और इस प्रकार हमेशा मन को आत्मा में स्थिर रखता है।
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6.28 युञ्जन् योग का अभ्यास करते हुए? एवम् इस प्रकार? सदा सदैव? आत्मानम् आत्मा को? योगी योगी? विगतकल्मषः पाप से मुक्त? सुखेन आसानी से? ब्रह्मसंस्पर्शम् ब्रह्म के संपर्क से? अत्यन्तम् अनंत? सुखम् आनंद? अश्नुते आनंद लेता है।टिप्पणी योग साधनाओं जैसे इंद्रियों की निवृत्ति? एकाग्रता और ध्यान के द्वारा वह इंद्रियों की वस्तुओं के साथ संपर्क खो देता है और अपने भीतर ब्रह्म या अमर आत्मा के साथ संपर्क में आता है और इस प्रकार ब्रह्म के अनंत आनंद का आनंद लेता है।इंद्रिय सुख क्षणिक या अस्थायी होते हैं लेकिन ब्रह्म का आनंद निरंतर? अक्षय और शाश्वत होता है। इसी कारण से किसी को आत्मा को साकार करने का प्रयास करना चाहिए।योगी उन बाधाओं को दूर करता है जो प्रभु के साथ मिलन प्राप्त करने के रास्ते में खड़ी होती हैं और इस प्रकार हमेशा मन को आत्मा में स्थिर रखता है।