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भगवद्गीता 6.26

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् | ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ||६-२६||
yato yato niścarati manaścañcalamasthiram . tatastato niyamyaitadātmanyeva vaśaṃ nayet ||6-26||
जहाँ से जहाँ भी यह चंचल और अस्थिर मन भटकता है, वहाँ से वहाँ से इसे संयमित करके केवल आत्मा के अधीन करें।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्द अर्थ उसी स्रोत से। स्रोत

6.26 यतःयतः जहाँ से जहाँ? निश्चरति भटकता है? मनः मन? चञ्चलम् चंचल? अस्थिरम् अस्थिर? ततःततः वहाँ से वहाँ से? नियम्य संयमित करके? एतत् इसे? आत्मनि आत्मा में? एव केवल? वशम् अधीन? नयेत् करें।व्याख्या इस श्लोक में भगवान मन को नियंत्रित करने की विधि देते हैं। जैसे आप बैल को बार-बार घर की ओर खींचते हैं जब वह भाग जाता है, वैसे ही आपको मन को बार-बार अपने केंद्र या लक्ष्य की ओर खींचना होगा जब वह बाहरी विषयों की ओर दौड़ता है। यदि आप बैल को अच्छे बीज का अर्क, शक्कर, केले आदि देते हैं, तो वह नहीं भागेगा बल्कि आपके घर में ही रहेगा। वैसे ही यदि आप मन को एकाग्रता के अभ्यास द्वारा धीरे-धीरे आत्मा के शाश्वत आनंद का स्वाद कराते हैं, तो वह धीरे-धीरे केवल आत्मा में ही रहेगा और इंद्रियों के बाहरी विषयों की ओर नहीं दौड़ेगा। ध्वनि और अन्य विषय ही मन को चंचल और अस्थिर बनाते हैं। इंद्रिय सुखों के दोषों को जानकर, उनकी भ्रामक प्रकृति को समझकर, वास्तविक और अवास्तविक के बीच विवेक और वैराग्य का विकास करके और मन को आत्मा की महिमा और तेज को समझाकर, आप मन को पूरी तरह इंद्रिय विषयों से दूर कर सकते हैं और इसे आत्मा पर दृढ़ता से स्थिर कर सकते हैं।

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