जब योग के अभ्यास द्वारा नियंत्रित किया गया मन शांति को प्राप्त होता है, और जब आत्मा द्वारा आत्मा को देखता हुआ, वह अपनी ही आत्मा में संतुष्ट हो जाता है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्दों के अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत
6.20 यत्र कहाँ? उपरमते शांति को प्राप्त होता है? चित्तम् मन? निरुद्धम् नियंत्रित? योगसेवया योग के अभ्यास द्वारा? यत्र कहाँ? च और? एव ही? आत्मना आत्मा द्वारा? आत्मानम् आत्मा को? पश्यन् देखता हुआ? आत्मनि आत्मा में? तुष्यति संतुष्ट हो जाता है।टिप्पणी श्लोक 20, 21, 22 और 23 को एक साथ लेना चाहिए। जब मन पूरी तरह से इंद्रियों की वस्तुओं से निकाल लिया जाता है, तो हृदय के भीतर परम शांति का राज होता है। जब मन निरंतर और दीर्घकालीन एकाग्रता के अभ्यास द्वारा बिल्कुल स्थिर हो जाता है, तो योगी उस शुद्ध और एकाग्र मन द्वारा परम आत्मा को देखता है और आत्मा के भीतर परम संतुष्टि को प्राप्त करता है।
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6.20 यत्र कहाँ? उपरमते शांति को प्राप्त होता है? चित्तम् मन? निरुद्धम् नियंत्रित? योगसेवया योग के अभ्यास द्वारा? यत्र कहाँ? च और? एव ही? आत्मना आत्मा द्वारा? आत्मानम् आत्मा को? पश्यन् देखता हुआ? आत्मनि आत्मा में? तुष्यति संतुष्ट हो जाता है।टिप्पणी श्लोक 20, 21, 22 और 23 को एक साथ लेना चाहिए। जब मन पूरी तरह से इंद्रियों की वस्तुओं से निकाल लिया जाता है, तो हृदय के भीतर परम शांति का राज होता है। जब मन निरंतर और दीर्घकालीन एकाग्रता के अभ्यास द्वारा बिल्कुल स्थिर हो जाता है, तो योगी उस शुद्ध और एकाग्र मन द्वारा परम आत्मा को देखता है और आत्मा के भीतर परम संतुष्टि को प्राप्त करता है।