One Source Sangha को बेहतर अनुभव के लिए इंस्टॉल करें

भगवद्गीता 6.20

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया | यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ||६-२०||
yatroparamate cittaṃ niruddhaṃ yogasevayā . yatra caivātmanātmānaṃ paśyannātmani tuṣyati ||6-20||
जब योग के अभ्यास द्वारा नियंत्रित किया गया मन शांति को प्राप्त होता है, और जब आत्मा द्वारा आत्मा को देखता हुआ, वह अपनी ही आत्मा में संतुष्ट हो जाता है।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्दों के अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत

6.20 यत्र कहाँ? उपरमते शांति को प्राप्त होता है? चित्तम् मन? निरुद्धम् नियंत्रित? योगसेवया योग के अभ्यास द्वारा? यत्र कहाँ? च और? एव ही? आत्मना आत्मा द्वारा? आत्मानम् आत्मा को? पश्यन् देखता हुआ? आत्मनि आत्मा में? तुष्यति संतुष्ट हो जाता है।टिप्पणी श्लोक 20, 21, 22 और 23 को एक साथ लेना चाहिए। जब मन पूरी तरह से इंद्रियों की वस्तुओं से निकाल लिया जाता है, तो हृदय के भीतर परम शांति का राज होता है। जब मन निरंतर और दीर्घकालीन एकाग्रता के अभ्यास द्वारा बिल्कुल स्थिर हो जाता है, तो योगी उस शुद्ध और एकाग्र मन द्वारा परम आत्मा को देखता है और आत्मा के भीतर परम संतुष्टि को प्राप्त करता है।

इस श्लोक पर Ananda के साथ विचार करें

यह श्लोक आपके अंदर क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — Ananda कई परंपराओं से ज्ञान लेता है और आपके अपने पथ का सम्मान करता है।

हमारे साथ चलें

एक अनुच्छेद, एक प्रश्न, हर रविवार। कुछ और नहीं, कभी नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी