बेहतर अनुभव के लिए One Source Sangha को इंस्टॉल करें

भगवद्गीता 6.2

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव | न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ||६-२||
yaṃ saṃnyāsamiti prāhuryogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava . na hyasaṃnyastasaṅkalpo yogī bhavati kaścana ||6-2||
हे अर्जुन, जिसे वे संन्यास कहते हैं, उसे ही तू योग जान। निश्चय ही जिसने संकल्पों का त्याग नहीं किया, वह योगी नहीं हो सकता।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ भी उसी स्रोत से हैं। स्रोत

6.2 यम् कौन सा? संन्यासम् संन्यास? इति इस प्रकार? प्राहुः (वे) कहते हैं? योगम् योग? तम् वह? विद्धि जान? पाण्डव हे पांडव? न नहीं? हि निश्चय ही? असंन्यस्तसङ्कल्पः जिसने संकल्पों का त्याग नहीं किया? योगी योगी? भवति बनता है? कश्चन कोई भी।टिप्पणी संकल्प मन की कल्पना शक्ति का कार्य है जो भविष्य के लिए योजनाएं बनाता है और उन योजनाओं के परिणामों का अनुमान लगाता है। कोई भी कर्म योगी नहीं बन सकता जो योजना बनाता है और अपने कार्यों के फल की अपेक्षा करता है। कोई भी कर्म भक्त जिसने अपने कार्यों के फलों के विचार का त्याग नहीं किया, वह स्थिर मन का योगी नहीं बन सकता। फलों के विचार निश्चित रूप से मन को अस्थिर कर देंगे। यहाँ भगवान कृष्ण कर्म योग की प्रशंसा करते हैं क्योंकि यह ध्यान योग का साधन या बाहरी सहायता (बहिरंग साधना) है। कर्म योग ध्यान योग की सीढ़ी है। यह समय के साथ ध्यान योग की ओर ले जाता है। कर्म योग के अभ्यास को प्रोत्साहित करने के लिए यहाँ कहा गया है कि कर्म योग ही संन्यास है। (cf. V.4)

इस श्लोक पर Ananda के साथ चिंतन करें

यह श्लोक आपके मन में क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — Ananda कई परंपराओं से आकर आपके अपने पथ का सम्मान करता है।

हमारे साथ चलें

एक अंश, एक प्रश्न, हर रविवार। कुछ और नहीं, कभी नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी