बेहतर अनुभव के लिए One Source Sangha इंस्टॉल करें

भगवद् गीता 6.18

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते | निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ||६-१८||
yadā viniyataṃ cittamātmanyevāvatiṣṭhate . niḥspṛhaḥ sarvakāmebhyo yukta ityucyate tadā ||6-18||
जब पूर्णतः नियंत्रित मन केवल आत्मा में विश्राम पाता है, सभी इच्छाओं की कामनाओं से मुक्त होकर, तब उसे 'युक्त' कहा जाता है।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत

6.18 यदा जब? विनियतम् पूर्णतः नियंत्रित? चित्तम् मन? आत्मनि आत्मा में? एव केवल? अवतिष्ठते विश्राम पाता है? निःस्पृहः कामनाओं से मुक्त? सर्वकामेभ्यः सभी (इच्छाओं) से? युक्तः युक्त? इति इस प्रकार? उच्यते कहा जाता है? तदा तब।टिप्पणी पूर्णतः नियंत्रित मन एकाग्र मन। जब देखी या अदेखी सभी इच्छाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब मन अत्यंत शांत हो जाता है और सर्वोच्च आत्मा में दृढ़तापूर्वक विश्राम पाता है। जैसे योगी पूर्णतः सामंजस्यपूर्ण है, जैसे उसने आत्मा के साथ एकता प्राप्त की है और जैसे वह ब्रह्म के साथ तादात्म्य को प्राप्त हुआ है, इंद्रिय घटनाएँ और शारीरिक आसक्तियाँ उसे विचलित नहीं करतीं। वह अपनी अमर, अविनाशी और अजेय प्रकृति के प्रति सचेत है।युक्त का अर्थ आत्मा के साथ युक्त (संयुक्त) या सामंजस्यपूर्ण या संतुलित है। आत्मा के साथ संयोग के बिना न तो सामंजस्य संभव है, न संतुलन और न ही समाधि। (तुलना देखें V.23VI.8)

Ananda के साथ इस श्लोक पर विचार करें

यह श्लोक आपके भीतर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — Ananda कई परंपराओं से प्रेरणा लेता है और आपके अपने पथ का सम्मान करता है।

हमारे साथ चलें

एक अंश, एक प्रश्न, हर रविवार। और कुछ नहीं, कभी नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी