श्रीभगवानुवाच |
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः |
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ||६-१||
śrībhagavānuvāca .
anāśritaḥ karmaphalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ .
sa saṃnyāsī ca yogī ca na niragnirna cākriyaḥ ||6-1||
श्रीभगवान् बोले — जो मनुष्य अपने कर्तव्य को उसके फलों पर आश्रित हुए बिना करता है, वह संन्यासी और योगी है; न कि वह जो अग्नि और कर्म से रहित है।
अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दार्थ भी इसी स्रोत से हैं। स्रोत
6.1 अनाश्रितः आश्रित नहीं? कर्मफलम् कर्म का फल? कार्यम् कर्तव्य? कर्म कार्य? करोति करता है? यः जो? सः वह? संन्यासी संन्यासी (त्यागी)? च और? योगी योगी? च और? न नहीं? निरग्निः अग्नि रहित? न नहीं? च और? अक्रियः कर्म रहित।भाष्य अग्निहोत्र आदि कर्म जिनका फल की अपेक्षा न करते हुए किया जाता है, मन को शुद्ध करते हैं और ध्यान योग या ध्यान के योग का साधन बनते हैं।कार्यम् कर्म कर्तव्य।निरग्निः अग्नि रहित। जिसने अग्निहोत्र जैसी दैनिक कर्मकांडी क्रियाओं का त्याग कर दिया है, जो अग्नि की सहायता से की जाती हैं।अक्रिय कर्म रहित। जिसने तप और दान-निर्माण, धर्मशाला, औषधालय आदि निर्माण, कूप खनन, दरिद्रों को भोजन कराने आदि पुण्य कार्यों का त्याग कर दिया है।संन्यासी जिसने अपने कर्मों के फल का त्याग किया है।योगी जिसका मन स्थिर है। ये दोनों शब्द उसके लिए गौण अर्थ में लागू होते हैं। वे यह दर्शाने के लिए नहीं हैं कि वह वास्तव में संन्यासी और योगी है।संन्यासी न तो अग्निहोत्र करता है और न ही अन्य कर्मकांड। किंतु केवल इन्हें छोड़ देना ही सच्चा त्याग नहीं है। (देखें V.3)
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6.1 अनाश्रितः आश्रित नहीं? कर्मफलम् कर्म का फल? कार्यम् कर्तव्य? कर्म कार्य? करोति करता है? यः जो? सः वह? संन्यासी संन्यासी (त्यागी)? च और? योगी योगी? च और? न नहीं? निरग्निः अग्नि रहित? न नहीं? च और? अक्रियः कर्म रहित।भाष्य अग्निहोत्र आदि कर्म जिनका फल की अपेक्षा न करते हुए किया जाता है, मन को शुद्ध करते हैं और ध्यान योग या ध्यान के योग का साधन बनते हैं।कार्यम् कर्म कर्तव्य।निरग्निः अग्नि रहित। जिसने अग्निहोत्र जैसी दैनिक कर्मकांडी क्रियाओं का त्याग कर दिया है, जो अग्नि की सहायता से की जाती हैं।अक्रिय कर्म रहित। जिसने तप और दान-निर्माण, धर्मशाला, औषधालय आदि निर्माण, कूप खनन, दरिद्रों को भोजन कराने आदि पुण्य कार्यों का त्याग कर दिया है।संन्यासी जिसने अपने कर्मों के फल का त्याग किया है।योगी जिसका मन स्थिर है। ये दोनों शब्द उसके लिए गौण अर्थ में लागू होते हैं। वे यह दर्शाने के लिए नहीं हैं कि वह वास्तव में संन्यासी और योगी है।संन्यासी न तो अग्निहोत्र करता है और न ही अन्य कर्मकांड। किंतु केवल इन्हें छोड़ देना ही सच्चा त्याग नहीं है। (देखें V.3)