बोलना, छोड़ना, पकड़ना, आँखें खोलना और बंद करना — इंद्रियाँ इंद्रिय-विषयों में चलती हैं, ऐसा मानते हुए।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
5.9 प्रलपन् बोलना? विसृजन् छोड़ना? गृह्णन् पकड़ना? उन्मिषन् खोलना (आँखें)? निमिषन् बंद करना (आँखें)? अपि भी? इन्द्रियाणि इंद्रियाँ? इन्द्रियार्थेषु इंद्रिय-विषयों में? वर्तन्ते चलती हैं? इति इस प्रकार? धारयन् मानते हुए।टिप्पणी मुक्त ऋषि या ज्ञानी सदा इंद्रियों की क्रियाओं के साक्षी के रूप में रहते हैं क्योंकि वे अपने को आत्मा या ब्रह्म से जोड़ते हैं। वे सोचते और कहते हैं, मैं नहीं देखता, आँखें देखती हैं। मैं नहीं सुनता, कान सुनते हैं। मैं नहीं सूँघता, नाक सूँघती है, आदि। वे कर्म में अकर्म को देखते हैं क्योंकि उन्होंने अपने कर्मों को ज्ञान की अग्नि में जला दिया है। (देखें XIV.1923)
इस श्लोक पर आनंद के साथ चिंतन करें
यह श्लोक आपके भीतर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से आहरण करता है और आपके अपने पथ का सम्मान करता है।
5.9 प्रलपन् बोलना? विसृजन् छोड़ना? गृह्णन् पकड़ना? उन्मिषन् खोलना (आँखें)? निमिषन् बंद करना (आँखें)? अपि भी? इन्द्रियाणि इंद्रियाँ? इन्द्रियार्थेषु इंद्रिय-विषयों में? वर्तन्ते चलती हैं? इति इस प्रकार? धारयन् मानते हुए।टिप्पणी मुक्त ऋषि या ज्ञानी सदा इंद्रियों की क्रियाओं के साक्षी के रूप में रहते हैं क्योंकि वे अपने को आत्मा या ब्रह्म से जोड़ते हैं। वे सोचते और कहते हैं, मैं नहीं देखता, आँखें देखती हैं। मैं नहीं सुनता, कान सुनते हैं। मैं नहीं सूँघता, नाक सूँघती है, आदि। वे कर्म में अकर्म को देखते हैं क्योंकि उन्होंने अपने कर्मों को ज्ञान की अग्नि में जला दिया है। (देखें XIV.1923)