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भगवद गीता 5.4

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः | एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ||५-४||
sāṅkhyayogau pṛthagbālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ . ekamapyāsthitaḥ samyagubhayorvindate phalam ||5-4||
बालक, बुद्धिमान नहीं, ज्ञान और कर्मयोग या कर्मों के प्रदर्शन को अलग और भिन्न मानते हैं; जो सच में एक में स्थापित है, वह दोनों के फल को प्राप्त करता है।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत

5.4 सांख्ययोगौ सांख्य (ज्ञान) और योग (कर्मयोग या कर्मों का प्रदर्शन)? पृथक् भिन्न? बालाः बालक? प्रवदन्ति बोलते हैं? न नहीं? पण्डिताः बुद्धिमान? एकम् एक? अपि भी? आस्थितः स्थापित? सम्यक् सच में? उभयोः दोनों के? विन्दते प्राप्त करता है? फलम् फल। टिप्पणी बालक अथवा अज्ञानी जन जिनके पास आत्म-ज्ञान नहीं है? और जिनके पास केवल शास्त्रों का सैद्धांतिक ज्ञान है। बालक या अज्ञानी लोग ही कहते हैं कि ज्ञान और कर्म का प्रदर्शन भिन्न हैं और अलग-अलग और विपरीत फल देते हैं। लेकिन आत्म-ज्ञान वाले बुद्धिमान कहते हैं कि वे समान फल ही देते हैं, अर्थात्? मोक्ष या मुक्ति। जो सांख्य या योग में उचित रूप से स्थापित है, जो सच में एक में रहता है, वह दोनों के फल को प्राप्त करता है। इसलिए फल में कोई विविधता नहीं है। यह इस श्लोक का सार है। (देखें VI.2)

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