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भगवद् गीता 5.23

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् | कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ||५-२३||
śaknotīhaiva yaḥ soḍhuṃ prākśarīravimokṣaṇāt . kāmakrodhodbhavaṃ vegaṃ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ ||5-23||
जो व्यक्ति इसी जीवन में, शरीर के मुक्ति से पहले, कामना और क्रोध से उत्पन्न प्रेरणा को सहन करने में सक्षम है — वह योगी है, वह सुखी व्यक्ति है।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत

5.23 शक्नोति सक्षम है? इह इस जगत में? एव ही? यः जो? सोढुम् सहन करने के लिए? प्राक् पहले? शरीरविमोक्षणात् शरीर की मुक्ति? कामक्रोधोद्भवम् कामना और क्रोध से उत्पन्न? वेगम् प्रेरणा? सः वह? युक्तः संतुलित? सः वह? सुखी सुखी? नरः व्यक्ति।टिप्पणी युक्त का अर्थ है योग में स्थिर या सामंजस्यपूर्ण। कामना और क्रोध शांति के शक्तिशाली शत्रु हैं। इन्हें नष्ट करना बहुत कठिन है। इन शत्रुओं को नष्ट करने के लिए आपको बहुत कठोर परिश्रम करना होगा। जब कामना शब्द का सामान्य अर्थ में प्रयोग किया जाता है तो इसमें सभी प्रकार की कामनाएं शामिल होती हैं। विशेष अर्थ में इसका मतलब वासना है। यहाँ रहने का अर्थ है जीवित रहना। कामना की प्रेरणा मन की व्याकुलता है जो रोमांच और प्रसन्न चेहरे से दर्शाई जाती है। क्रोध की प्रेरणा मन की व्याकुलता है जो आग जैसी आँखों? पसीने आने? होंठ को काटने और शरीर के कांपने से दर्शाई जाती है। इस श्लोक में आप स्पष्ट रूप से समझेंगे कि जिस व्यक्ति ने कामना और क्रोध पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है वह इस दुनिया में सबसे सुखी व्यक्ति है? न कि वह जिसके पास विशाल संपत्ति? सुंदर पत्नी और सुंदर बच्चे हैं। इसलिए आपको कामना और क्रोध को उखाड़ फेंकने का हर संभव प्रयास करना चाहिए? जो अनंत आनंद के भयानक शत्रु हैं। कामना सुखद और मनभावन वस्तु की तरफदारी है जो सुख देती है और जिसे देखा? सुना या याद किया जाता है। क्रोध असुखद और अप्रिय वस्तु के प्रति विरुद्ध भाव है जो दर्द देती है और जिसे देखा? सुना या याद किया जाता है। एक योगी कामना और क्रोध से उत्पन्न प्रेरणा को नियंत्रित करता है? पसंद और नापसंद की धाराओं को नष्ट करता है? और अंतरतम आत्म में विश्राम करके मन की समता को प्राप्त करता है? और इसलिए वह बहुत सुखी है। (cf.VI.18)

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